छोटी छोटी सी बाते

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yatindrapandey


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एक यतींद्र मार दिया तुमने

Posted On: 3 Dec, 2016  
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असंतुलन की परिभाषा

Posted On: 20 Nov, 2016  
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जब रिश्तें

Posted On: 17 Aug, 2016  
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शान्ति से जीने दो काफ़िरों।

Posted On: 18 Jul, 2016  
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मुझे नहीं चाहिए मुफ्त का धुवाँ

Posted On: 15 Apr, 2014  
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किसी और के लिए दुआ मांग के तो देखो

Posted On: 25 Feb, 2014  
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दो सौ में अंतिम संस्कार (कांटेस्ट)

Posted On: 28 Jan, 2014  
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आज मेरा जन्मदिन है “कांटेस्ट पूर्वप्रकाशित”

Posted On: 25 Jan, 2014  
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कही मै निर्वस्त्र तो नहीं “कांटेस्ट पूर्वप्रकाशित”

Posted On: 25 Jan, 2014  
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पुर्णतः सत्य

Posted On: 20 Jan, 2014  
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मेरा उन्हें नीचा दिखाने का मकसद नहीं था, बस मै ये चाहता था की आप जो भी करते है उस का मकसद साफ़ हो क्युकी गीता पढने से कुछ नहीं होगा, और पढ़ लिया तो अपने लिए कुछ खाश समझ लेने से कुछ नहीं होगा, सत्य को जानने मे और अमल करने मे ही भलाई है. घर मे गीता या कोई भी धार्मिक किताब रखने से कुछ नहीं होगा उसे पढना पड़ेगा समझना पड़ेगा और वास्तविकता को जानना पड़ेगा. कोई धार्मिक किताब सिर्फ उम्र दराज के लिए हो ये भी सही नहीं वो सभी युवाओ के लिए भी है, आपके मन की हर प्रश्न का जवाब आपको वही मिलेगा. जिस तरह से हमने नए समाज के परिवेश को तकनिकी को अपनाया वैसे ही हमें अब नयी सोच को अपनाना होगा समझना होगा और ये शुरुवात मेट्रो की तरह सिर्फ बड़े शहरो से नहीं होनी चाहिए बल्कि भारत के प्रान्त-प्रान्त मे होनी चाहिए.सार्थक लेखन यतीन्द्र जी

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अब तक के तुम्हारी लिखी रचनाओ की ये एक नवीनीकरण है जिसमे तुमने सारी भावनाओ को उन्हें में लिखी भावनाओ द्वारा ही विस्तृत कर दिया.मन के किसी कोने में मेरी दबी बातो को तुमने शब्द दे दिए है.मेरा मन अब कुछ शांत है. जीवन में अविरल ऐसे हे बड़ते जाना, रुकना तुमारी नियति नहे है, बस यु हे बहते जाना, एक मोड़ मिलेगा, जहाँ तुम देख्गो, एक झुण्ड, उन बिछड़े लोगो का, जहाँ वक़्त ने करवटें बदल कर, कितने हे जीवन को परिवर्तित कर, जीवन के ही एक हिस्से का दमन कर दिया, अब सारा दायित्व है तुम पर, आजाद कर दो, उन विचारो को, और फैला दो शांति के वो लहर, जो कभी रुके हे नहे, बस चलती हे रहे, चलती हे रहे . तुम्हारी इस रचना के लिए शायद मेरे पास शब्द कम पद गये है,जो नहीं कहा वो भी समझ जाओ.

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से घर आपका, तो ये शहर और ये देश भी आप का ही है। तो क्या ये शिष्टाचार आपको छड़ी लेकर समझाना होगा की अपने शहर को पान की थूक से गन्दा न करे। एटीएम मशीन मे डस्टबिन होने के बाद भी कागज इधर उधर फेका रहता है ये आपके बुरे चरित्र का ही व्याख्यान करता है। रोज अखबार मे संस्कार का ज्ञान आता है, पर आपके पास करने को बहुत कुछ है पर उसे पढने का समय नहीं। मुझे ये कहते बिलकुल भी अफ़सोस नहीं है की, अगर आज भारत देश गंदगी से भरा है, तो सिर्फ और सिर्फ ऐसे शिष्टाचार की वजह से जहाँ देश के नागरिक को ये नहीं पता की पान खाकर थूकना कहा है। शुरवाती शिष्टाचार का पालन तो हर कोई कर ही सकता है। जैसे किसी महिला या बूढ़े व्यक्ति को अपनी जगह बैठा कर, क्रमबद्ध तरीके से मेट्रो मे घुस कर ,पान व् गुटखा इधर-उधर न थूक कर, एटीएम मशीन मे डस्टबिन मे ही कागज डाल कर , रेल की पटरी पर कोई बोतल या सामान न फेक कर और ऐसी बहुत सी छोटी छोटी सी बाते है जिसका हम अपने जीवन मे पालन कर सकते है, और अपने देश को साफ़ रख सकते है। पर इस बात पे ये कह देना की भारत बस चल रहा है, या सरकार का दोष है तो उपयुक्त नहीं होगा। बिलकुल सही कहा आपने ! हम सिर्फ सरकार को दोष देकर अपने कर्त्तव्य और अपने फ़र्ज़ से नहीं बाख सकते ! ये हमारी आदत में शामिल होना चाहिए की जैसे हम अपने घर को साफ़ रखते हैं उसी तरह अपने शहर को भी साफ़ रख सकें ! सार्थक लेखन श्री पाण्डेय जी

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