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शान्ति से जीने दो काफ़िरों।

Posted On 18 Jul, 2016 में

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शान्ति से जीने दो काफ़िरों

आज देश में क्या चल रहा है ये अब मेरे समझ से बाहर हो गया है एक घृणा का भाव पूरे देश में चरमोत्कर्ष पर है । लोगों के अंदर की ये घृणा देख पाना मुश्किल हो गया है, ये आग ना जाने किसने लगायी है जिसकी लपट से सारे झुलस रहे है । जहाँ देखो पर्दे के पीछे बैठ कर एक दूसरों की ग़लतियाँ ,एक दूसरे पर इल्ज़ाम लगाए जा रहे है । आप सभी से अनुरोध है सभी लेखक भाइयों से अनुरोध है इस देश को मज़बूत बनाए मजबूर नहीं । क्या आप इस देश को उन्ही दंगों का शिकार कराना चाहते है , जिसमें मरता एक इंसान है । लहू बहते है , इज़्ज़त लुटती है वो औरत और बच्चें ही होते है । क्या वो दौर वापस आ जायेगा? घृणा और नफ़रत देख कर ऐसा ही लग रहा है। बस ये समझ नहीं पता की एक आदमी की घृणा या नफ़रत दूसरे बिना जाँचे परखें अपनें अंदर कैसे समाहित कर रहे है ।

वो चार मुसलमान भी काफ़िर है,
वो चार हिन्दू भी काफ़िर है,
वो आत्मा भी काफ़िर है,
वो सोच भी काफ़िर है,
जो देश को मातम की आग में जलाना चाहते है ।

आइने में ख़ुद की शक्ल देख काफ़िर,
अपने खुदा से डर, अपने ईश्वर से डर,
इतिहास गवाह है,
जब जब हम लड़े है,
हमें तीसरी सत्ता ने दबाया है,
हमें ग़ुलामी की छांव से ढका है।

क्यूँ हम उन माध्यम को जो हमारे मनोरंजन या हमारा ज्ञान बढ़ाने में हमें सहूलियत दे सकते है, हम उसे धर्म, ज़ात, मज़हब की लड़ाईं का अड्डा बना रहे है । क्या हो गया है हमारे देश के लोगों को जो किसी की भी बात में आने लगे है।

आपको भी पता होगा की चिंगारी काफ़ी है किसी भी हिंसा को बढ़ाने में और हिंसा से किसी का भला नहीं हुआ। जिस कड़वे दौर से ये देश ना जाने कितना आगे निकल गया है, हम सब नए तकनीकी से उसे फिर वही धकेल रहे है। ये कैसा विकास है ये तो कोई बुद्धिजीवी ही बताए बस वो समान भाव रखता हो। अंत में बस इतना कहूँगा….

रूख हवाँ का ख़राब है मगर,
भटका नहीं वो मंज़िलो से,
चार क़दम हो या चार दीवारें,
सहमा नहीं वो दरिंदो से,
मज़हबी लड़ाई का अंत बुरा ही होता है,

रोता भी इंसान है और खोता भी इंसान।

अल्लाह के नुमाइंदों,
ईश्वर के भक्तों
पालना भी तुम्हें है, सहेजना भी तुम्हें है ।

यतींद्र

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