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जाहिल थी झल्ली थी

Posted On: 10 Feb, 2017 में

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जाहिल थी झल्ली थी

वो गलियों में तंग घुमा करती थी,

जाहिल थी ,

झल्ली थी ,

वो ठंडे पानी को भी,

फूँक कर पिया करती थी,

वो ना जानती रंग भेद क्या है,

वो ना जाने स्वार्थ

और लोभ क्या है,

अल्लाह के सितम भी

हंस कर सहती थी,

जाहिल थी,

झल्ली थी |

उसने दुनिया का ढाँचा नहीं देखा,

उसने समाज का कोलाहल नहीं देखा,

वो तो मिट्टियों में,

फेरी ख़ुद की उँगलियों

से बने आकृति को

संसार समझती थी,

जाहिल थी,

झल्ली थी |

रातों को तारों को गिनना,

सूरज को टकटकी लगा कर देखना,

मुट्ठी में भरी रेत को

हाथो से धीरे-धीरे गिराने को

ज़िंदगी समझती थी ,

जाहिल थी,

झल्ली थी |

पर कुछ ज़रूरत मंदो को

उसकी ज़रूरत थी,

उसकी नियती

उसने ख़ुद नहीं बुनी थी,

अब वो एक गहरें दलदल का

हिस्सा थी,

और ये एक स्वप्निल समाज की

उपलब्धी थी|

हम्म

वो जहिल थी,

झल्ली थी…..

वो जाहिल थी,

झल्ली थी ना

यतींद्र

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1 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
February 14, 2017

प्रिय यतीन्द्र जी मन को छू लेने वाली पंक्तियाँ सूरज को टकटकी लगा कर देखना, मुट्ठी में भरी रेत को हाथो से धीरे-धीरे गिराने को ज़िंदगी समझती थी ,


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